Draft
1] 1931 में सब की जातिगत जनगणना हो ही गई थी अभी भी आंकड़े लगभग वही होंगे। मंडल कमीशन के समय भी जातिगत गिनती नहीं कराई गई थी, 1931 का जातिगत आंकड़ा लिया गया था। सिर्फ सरकारी कर्मचारियों की जातिगत गिनती कराई गई थी, तो अभी भी बिना जातिगत गिनती के सरकारी कर्मचारियों की जातिगत संख्या बताई जा सकती है। यह उत्तर प्रदेश सरकार के अधिकार में है। [2] 'आइने अकबरी' जो खुद अबुल फज़ल ने लिखा था, उसमें उन्होंने किस जाति के कितने जमींदार हैं, इसका जातिगत ब्योरा दिया था। उसमें 80 जमींदार जाट, 22 कुर्मी और 22 अहीर थे, यानी यह लोग कभी शोषित-पीड़ित नहीं रहे हैं। इसके अलावा पप्पू यादव ने खुद अभी बताया था कि वह लोग सदियों से जमींदार हैं। मंडल कमीशन बनाने वाले बी. पी. मंडल खुद 60,000 एकड़ के बड़े जमींदार थे और मित्र सेन यादव उस जमाने में 20 लाख के जमींदार थे, यानी अहीर सदैव राज किए हैं, इसलिए यह सामाजिक रूप से कभी पिछड़े नहीं रहे। [3] अन्य समकालीन स्रोतों से जो अहीर, कुर्मी और जाट की जमींदारी है, वह प्रस्तुत की जा रही है। [4] केंद्र सरकार ने जाटों के आरक्षण के लिए एक कमेटी बनाई थी, जिसने उत्तर प्रद...